This is a poem for a very dear friend of mine who has gone through many difficulties. She wanted me to write a poem on her life which she would like to give her son when he gets married. It will be many years when she will give. But she wanted me to share on Sulekha. I thank her for making me write this one.
मेरे बेटे
तुम्हे इस तोहफे पर अचरज होगा
लेकिन यह जीवन के कुछ लमहें हैं
तुम
जिसे अपने घर ला रहे हो
किसी की बेटी है
बेटा उसे इतनी हिकारत न देना
की उसके बुजुर्ग तुम्हे
बददुआ न दे सके क्योंकि
तुम उनकी बेटी के नसीब हो
तुम
उसे मारोगे नही
बहुत सभ्य हो
पर उसे शब्दों से प्रताडित करोगे तो
मेरी नज़र में तुम असभ्य हुए
वह
जो तुम्हारा हाथ थाम कर
इस घर में आई है
औरो के सामने उसका मजाक बनाकर
अपनी मर्दानगी का अहसास न करना
अपने ही सुखों का ध्यान न रखकर
उसे भी इन्सान समझना
अपने बराबर का
तुमने
उसे देखा परखा तो होगा
उसे अब किसी अप्राप्य प्रियतमा की तौल में मत तौलना
ख़ुद दरख्त के नीचे बैठ कर
झुलसती धूप उसे न देना
और इतना भी मजबूर न करना
की वह कहीं की न रहे
अगर ऐसा हुआ तो दो पल रुक कर सोचना
अगर तुम्हारी बेटी को तुम जैसा पति मिला तो क्या होगा
तुम
कहा हुआ मानोगे
क्योंकि तुम मेरे बेटे हो
इन सब बातों को पुस्तक में न खोजना
यह मेरी राह का सार समझना
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